Thursday, July 18, 2019

एक गोत्रय (भाई बहिनी) बीच भएको बिहे को घोर भर्तसना गर्छु

एक गोत्रय (भाई बहिनी) बीच भएको बिहे को घोर भर्तसना गर्छु।एक गोत्रय बेहि गर्ने गराउने सबै लाई समाज मा पूर्ण रूप बहिस्कार गर्न समस्त देव स्वजाती लाई आह्वान गरिएको छ। यदि यस्तो बिकृति लाई अहिले बहिष्कार गरियेन भने सिंगो देव समुदाय लाय असर पर्ण आउँछ।यस्तो एक गोत्रय बिहे लगायत दोस्रो जाती मा गर्ने बिहेलाई पूर्ण रुपमा देव स्वजाति बाट निर्मूल गरी प्रतिबंध लगाऊ। जसले समाज को बिपरीत कार्य गर छ उसलाई समाज मा पूर्ण बहिस्कार गरूम। देव समुदाय एक जुट भएर अगड़ी बडम।। 
देव समुदाय लाइ थाह भएको कुरा हो। सम्पूर्ण देव स्वजाति लाई आज चुनौती दिएको छ। सत्य कुरा बोलने आज कुनै पनि देव समुदाय को ब्यक्ति र संस्थाले चाहेको छैन किन सबै मौन छ कीन किन ?????
देव समाज को सल्लाहकार ,बागेश्वरी सेवा समिति को काठमांडू इकाई को अध्यक्ष र पशुपति विकाष कोष को सदस्य समेत रहनु भएको देव समुदाय को निकै ठुलो हस्ति भएको ब्यक्ति भगवती देव आफ्नो दोस्रो छोरी रीना देव को आफ्नै एक गोत्रीय नाता काका पर्ने शिवा चौधरी देव को छोरा मनीष चौधरी देव संग देव समुदाय को रीतिरिवाज संस्कृति अपनाई काठमांडू को आफ्नो घर निज नीवास 23-03-2076 सोमबार को दिन एक गोत्रीय भाई बहिनी बीच धूम धाम ले बिहे गराए को  र 30-03-2076 सोमबार को दिन काठमांडू होटल रैडिसन मा बहु भोज मा देव समुदाय को विभिन्न संघ संस्था को पदाधिकारी लगायत देव सेवा समिति को अधिकांस ब्यक्ति र देव समुदाय म उच्च छबि भएको को अधिकांस ब्यक्ति लगायत आफन्त र नाता गोता भएको र काठमांडू को अधिकांश देव संयदाय उपस्थिति भई नाच गान गारी जाड़ रकसी भोज भतेर खाई हर्सो उल्लास का साथ यो एक गोत्रय बिहेलाई समर्थन गर्नु। सींगो देव समुदाय को लगी दुर्भाग्य पूर्ण रहे को कुरा समस्त देव स्वाजाती लाई बिधि बत थाह भएको कुरा हो। आज सम्पूर्ण देव समुदाय यो भगवती देव को प्रति मौन छ कैसैले यसको खिलाफ केहि बोलने हिमत गरेन। र यही भगवाती देव हो देव समाज काठमांडू दुवार डॉ योगेंद्र देव को छोरा र छोरी को दोस्रो जाती मा बिहे को बिरोध गर्न लगा को थियो। बागेश्वरी सेवा समिति दुवारा डॉ राजकुमार चौधरी देव को छोरा को एक गोत्रीय ,राजनारायण देव की छोरा छोरी को एक गोत्रय , अखण्ड नारायण चौधरी देव को छोरा डॉ नबीन देव को एक गोत्रय बिहे को पूरा बिरोध गरेको थियो। र आज यही भगवती देव जी ले पैसा को आडमा सींगो देव समुदाय लाई नै खुला रूप मा चुनौती दिसके को छ।। यस बांट यो परसट हुन गएको छ की उच्च छबि को पैसा बाला हरुले आफ्नो सामाजिक मर्यादा र दायित्व बिरसेर समाज र समुदाय भन्दा माथि आफ्नो पैसाको तागत ले एक गोत्रय शादी भाई बहिनी बीच को बिहेलाई पैसा को आड़ मा छोपन खेजेको छ र समाज लाई आगामी दिन मा एक गोत्रय बिहे लाई प्रोत्साहन गर्न लाई यत्रो गरेको रहस्य खुलना आयो।। आज देव समुदाय को सम्पूर्ण संघ संस्था ले भगवती देव लाई समर्थन गरेको  कुरा सम्पूर्ण देव समुदाय लाई थाह भएको कुरा हो। र यो सोसल मिडिया मा पनि यो बिहेलाई समर्थन गर्ने भेटियो को प्रति यो देव समुदाय बिकृति तीर गएको कुरा थाहा हुन आयो। देव संमुदाय भित्र सत्य लाई साथ दिने र बिकृति को खिलाफ गर्ने हिमत छैन।
देव समुदाय लाइ थाह भएको कुरा हो।सम्पूर्ण देव स्वजाति भित्र यो एक गोत्रय भाई बहिनी को बिहे लाई पूर्ण रूप मा सर समाज जातीय संमुदाय बाट पूर्ण रूप मा बहिष्कार गरिएको छ।र सामाजिक जातीय कार्यक्रम हरू म यस्तो ब्यक्ति लाई पूर्ण रूप मा बन्देज गराउन पर्ने सबै देव स्वजाति समुदायआग्रह गर्छु। सम्पूर्ण देव स्वजाति लाई आज चुनौती दिएको छ। सत्य कुरा बोलने आज कुनै पनि देव समुदाय को ब्यक्ति र संस्थाले चाहेको छैन किन सबै मौन छ कीन किन ?????

Sunday, October 14, 2012

NAVARATRI PUJA PROCESS- DAY 1 TO DAY 9 IN HINDU

है | आपलोग के स्वस्थ दीर्घ आयु और उन्ती परगति और ढेर सारे खुसिया आप की जीबन में आये | माँ दुर्गा भबानी आपलोगों की मनो कामना पूर्ण करे … जय माँ दुर्गा भबानी आप के चरणों में सादर परनाम .. प्रेमसे बोलो दुर्गा माता की जय …..


During the festival of Navratri, Goddess Durga Devi is worshiped in nine avatars. During these nine holy days, each day of goddess Durga Mata is worshiped in different avatara.

First day of Navratri – Kalasha Sthapana (Kalasha Pooja) or Ghata Sthapana – Shailaputri Puja
Second day of Navratri – Preeti Dwitiya – Brahmacharini Puja
Third day of Navaratri – Chandrakanta pooja or Chandraghanta puja
Fourth day of Navaratri – Kushmanda pooja
Fifth day of Navratri – Skandamata Puja – Lalitha Panchami
Sixth day of Navratri – Katyayani Puja – Maha Shashti or Durga Shashti
Seventh day of Navratri – Kaalratri Pooja – Durga Saptami or Maha Sapthami
Eighth day of Navaratri – Maha Gauri Pooja – (Durgashtami Puja/Maha Ashtami/Veerashtami)
Ninth day of Navaratri – Siddhidatri Puja – (Mahanavami/Maharnavami or Durga Navami)
Tenth day of Navratri – Aparajitha Puja or Shami Pooja – Vijaya Dashami or Dasara

NAVARATRI PUJA PROCESS- DAY 1 TO DAY 9 IN HINDU












नवरात्रि का त्योहार नौ दिनों तक चलता है। इन नौ दिनों में तीन देवियों पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ स्वरुपों की पूजा की जाती है। पहले तीन दिन पार्वती के तीन स्वरुपों (कुमार, पार्वती और काली), अगले तीन दिन लक्ष्मी माता के स्वरुपों और आखिरी के तीन दिन सरस्वती माता के स्वरुपों की पूजा करते हैं।

वासन्तिक नवरात्रि के नौ दिनों में आदिशक्ति माता दुर्गा के उन नौ रूपों का भी पूजन किया जाता है। माता के इन नौ रूपों को नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रि के इन्हीं नौ दिनों पर मां दुर्गा के जिन नौ रूपों का पूजन किया जाता है वे हैं – पहला शैलपुत्री, दूसरा ब्रह्माचारिणी, तीसरा चन्द्रघन्टा, चौथा कूष्माण्डा, पाँचवा स्कन्द माता, छठा कात्यायिनी, सातवाँ कालरात्रि, आठवाँ महागौरी, नौवां सिद्धिदात्री।

प्रथम दुर्गा : श्री शैलपुत्री

Mata Shailputri – First Avatara of Durga :

Mata Shailputri is a daughter of ‘Parvata raju’ (mountain king) – Himalaya / Himvanth. She is the first among nine avatars of Durga and worshiped on the First day of Navaratri . In her previous birth, she was ‘Sati Bhavani Mata’, the daughter of King Daksha. Mata Shailputri, also known as Parvati got married with Lord Shiva. On the first day of Durga Navratri, Paravathi Devi she is worshipped. Mata Shailputri holds a ‘Trishul’, a weapon, in her right hand and a lotus in her left hand. She rides on bull. She has pleasant smile and blissful looks.

नवरात्री प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा विधि

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्द्वकृत शेखराम।
वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम॥

श्री दुर्गा का प्रथम रूप श्री शैलपुत्री हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण ये शैलपुत्री कहलाती हैं। नवरात्र के प्रथम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। गिरिराज हिमालय की पुत्री होने के कारण भगवती का प्रथम स्वरूप शैलपुत्री का है, जिनकी आराधना से प्राणी सभी मनोवांछित फल प्राप्त कर लेता है।

द्वितीय दुर्गा : श्री ब्रह्मचारिणी

Mata Brahmacharini – Second Avatara of Durga :

Mata Brahmacharini is worshipped on second day of Navarathri. Brahmacharini is the goddess who performed ‘Tapa’ (penance) (Brahma – Tapa , Charini – Performer ). Mata personifies love and loyalty. She holds japa mala in her right hand and Kamandal in left hand. She is also called as ‘Uma’ and ‘Tapacharini’ and provides knowledge and wisdom to her devotees.

नवरात्री दूसरा दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि

“दधना कर पद्याभ्यांक्षमाला कमण्डलम।
देवी प्रसीदमयी ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥“

श्री दुर्गा का द्वितीय रूप श्री ब्रह्मचारिणी हैं। यहां ब्रह्मचारिणी का तात्पर्य तपश्चारिणी है। इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप से प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। अतः ये तपश्चारिणी और ब्रह्मचारिणी के नाम से विख्यात हैं। नवरात्रि के द्वितीय दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है।

जो दोनो कर-कमलो मे अक्षमाला एवं कमंडल धारण करती है। वे सर्वश्रेष्ठ माँ भगवती ब्रह्मचारिणी मुझसे पर अति प्रसन्न हों। माँ ब्रह्मचारिणी सदैव अपने भक्तो पर कृपादृष्टि रखती है एवं सम्पूर्ण कष्ट दूर करके अभीष्ट कामनाओ की पूर्ति करती है।

तृतीय दुर्गा : श्री चंद्रघंटा

Mata Chandraghanta – Third Durga :

Mata Chadraghanta is worshipped on the thrid day of Navratri. She is very bright and charming. Durga Maa is astride a tiger, displays a golden hue to HER skin, possesses ten hands and 3 eyes. Eight of HER hands display weapons while the remaining two are respectively in the mudras of gestures of boon giving and stopping harm. Chandra + Ghanta, meaning supreme bliss and knowledge, showering peace and serenity, like cool breeze in a moonlit night.

नवरात्री तीसरा दिन माता चंद्रघंटा की पूजा विधि

“पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैयुता।
प्रसादं तनुते मद्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥“

श्री दुर्गा का तृतीय रूप श्री चंद्रघंटा है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। नवरात्रि के तृतीय दिन इनका पूजन और अर्चना किया जाता है। इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।

इनकी आराधना से मनुष्य के हृदय से अहंकार का नाश होता है तथा वह असीम शांति की प्राप्ति कर प्रसन्न होता है। माँ चन्द्रघण्टा मंगलदायनी है तथा भक्तों को निरोग रखकर उन्हें वैभव तथा ऐश्वर्य प्रदान करती है। उनके घंटो मे अपूर्व शीतलता का वास है।

चतुर्थ दुर्गा : श्री कूष्मांडा

Mata Kushmanda – Fourth Durga :

Mata Kushmanda is worshipped on the fourth day of Navrathri. . She shines brightly with a laughing face in all ten directions as the Sun. She controls whole Solar system. In her eight hands, she holds several types of weapons in six hands and a rosary and a lotus in remaining hands. She rides on Lion. She likes offerings of ‘Kumhde’, hence her name ‘Kushmanda’ has become popular.

नवरात्री चौथे दिन माता कूष्माण्डा की पूजा विधि
”सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च।
दधानाहस्तपद्याभ्यां कुष्माण्डा शुभदास्तु में॥“

श्री दुर्गा का चतुर्थ रूप श्री कूष्मांडा हैं। अपने उदर से अंड अर्थात् ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मांडा देवी के नाम से पुकारा जाता है। नवरात्रि के चतुर्थ दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। श्री कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक नष्ट हो जाते हैं।

इनकी आराधना से मनुष्य त्रिविध ताप से मुक्त होता है। माँ कुष्माण्डा सदैव अपने भक्तों पर कृपा दृष्टि रखती है। इनकी पूजा आराधना से हृदय को शांति एवं लक्ष्मी की प्राप्ति होती हैं।

पंचम दुर्गा : श्री स्कंदमाता

Ma Skanda Mata – Fifth Durga :

Skanda Mata is worshipped on the fifth Day of Navratri. She had a son ‘Skandaa and holds him on her lap . She has three eyes and four hands; two hands hold lotuses while the other 2 hands respectively display defending and granting gestures. Its said, by the mercy of Skandmata, even the idiot becomes an ocean of knowledge. The great and legendary Sanskrit Scholar Kalidas created his two masterpieces works “Raghuvansh Maha Kavya” and “Meghdoot” by the grace of Skandmata. Mata is considered as a deity of fire. She rides on Lion.

नवरात्री पंचमी दिन स्कंदमाता की पूजा विधि
“सिंहासनगता नित्यं पद्याञ्चितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥“

श्री दुर्गा का पंचम रूप श्री स्कंदमाता हैं। श्री स्कंद (कुमार कार्तिकेय) की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। नवरात्रि के पंचम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। इनकी आराधना से विशुद्ध चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं।

इनकी आराधना से मनुष्य सुख-शांति की प्राप्ति करता है। सिह के आसन पर विराजमान तथा कमल के पुष्प से सुशोभित दो हाथो वाली यशस्विनी देवी स्कन्दमाता शुभदायिनी है।

षष्ठम दुर्गा : श्री कात्यायनी

Mata Katyayani – Sixth Durga :

Mata Katyayani is worshippedon the the Sixth Day of Navratri. Rishi Katyayan observed a penance to get Jaganmata as his daughter. She blessed him and took birth as his daughter on the bank of river Jamuna for getting Lord Krishna as a husband. She is considered as prime deity of Vraj mandal. Ma Katyayani has three eyes and four hands. . One left hand holds a weapon and the other a lotus She rides on Lion.

नवरात्री पूजा – छठे दिन माता कात्यायनी की पूजा विधि

“चन्द्रहासोज्जवलकरा शार्दूलावरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्यादेवी दानव घातिनी॥“

श्री दुर्गा का षष्ठम् रूप श्री कात्यायनी। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसलिए वे कात्यायनी कहलाती हैं। नवरात्रि के षष्ठम दिन इनकी पूजा और आराधना होती है।

इनकी आराधना से भक्त का हर काम सरल एवं सुगम होता है। चन्द्रहास नामक तलवार के प्रभाव से जिनका हाथ चमक रहा है, श्रेष्ठ सिंह जिसका वाहन है, ऐसी असुर संहारकारिणी देवी कात्यायनी कल्यान करें।

सप्तम दुर्गा : श्री कालरात्रि

Mata Kalratri – Seventh Durga :

Mata Kalaratri is worshipped on the Seventh Day of Navratri . She is dark and black like night, hence she is called as ‘Kalratri’. Her hairs are unlocked and has three eyes and four hands.while the remaining 2 are in the mudras of “giving” and “protecting”. HER vahana is a faithful donkey. The destroyer of darkness and ignorance. She spills out fire from her nostrils. She holds a sharp Sword in her right hand and blesses her devotees with her lower hand. As she blesses her devotees with prosperity, she is also called as ‘Shubhamkari’.

नवरात्री पूजा – सप्तमी दिन माता कालरात्रि की पूजा विधि
“एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।
वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥“

श्रीदुर्गा का सप्तम रूप श्री कालरात्रि हैं। ये काल का नाश करने वाली हैं, इसलिए कालरात्रि कहलाती हैं। नवरात्रि के सप्तम दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है। इस दिन साधक को अपना चित्त भानु चक्र (मध्य ललाट) में स्थिर कर साधना करनी चाहिए।

संसार में कालो का नाश करने वाली देवी ‘कालरात्री’ ही है। भक्तों द्वारा इनकी पूजा के उपरांत उसके सभी दु:ख, संताप भगवती हर लेती है। दुश्मनों का नाश करती है तथा मनोवांछित फल प्रदान कर उपासक को संतुष्ट करती हैं।

अष्टम दुर्गा : श्री महागौरी

Mata Maha Gauri – Eighth Durga :

Mata Maha Gowri is worshipped on the Eight Day of Navratri. Maha Gauri looks as white as moon and jasmine. She has three Eyes and four hands. Peace and compassion radiate from HER being and SHE is often dressed in a white or green sari. SHE holds a drum and a trident and is often depicted riding a bull . Her above left hand is in fearless pose and she holds ‘Trishul’ in her lower left hand. Her above right hand has tambourine and lower right hand is in blessing mudra.

नवरात्री की अष्टमी दिन माता महागौरी की पूजा विधि
“श्वेत वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बर धरा शुचि:।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥“

श्री दुर्गा का अष्टम रूप श्री महागौरी हैं। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है, इसलिए ये महागौरी कहलाती हैं। नवरात्रि के अष्टम दिन इनका पूजन किया जाता है। इनकी उपासना से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

माँ महागौरी की आराधना से किसी प्रकार के रूप और मनोवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है। उजले वस्त्र धारण किये हुए महादेव को आनंद देवे वाली शुद्धता मूर्ती देवी महागौरी मंगलदायिनी हों।

नवम् दुर्गा : श्री सिद्धिदात्री

Mata Siddhidatri – Ninth Durga :

Mata Siddhidatri is the worshipped on the Ninth Day of Navratri. Maha Shakti gives all the eight siddhis – Anima, Mahima, Garima, Laghima, Prapti, Prakamya, Iishitva and Vashitva. According to ‘Devi Puran’, the supreme God Shiva got all these siddhis by worshipping the supreme Goddess Maha Shakti. With her gratitude, his half body has become of Goddess, hence Lord Shiva’s name ‘Ardhanarishvar’ has become famous. According to some sources she drives on Lion. Other sources say, she is seated on lotus. Siddhidatri Devi is worshipped by all Gods, Rushis, Muniswaras, Siddha yogis, and all common devotees who want to attain the religious asset.

नवरात्री पूजा की नवमी दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा विधि

“सिद्धगंधर्वयक्षादौर सुरैरमरै रवि।
सेव्यमाना सदाभूयात सिद्धिदा सिद्धिदायनी॥“

श्री दुर्गा का नवम् रूप श्री सिद्धिदात्री हैं। ये सब प्रकार की सिद्धियों की दाता हैं, इसीलिए ये सिद्धिदात्री कहलाती हैं। नवरात्रि के नवम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है।

सिद्धिदात्री की कृपा से मनुष्य सभी प्रकार की सिद्धिया प्राप्त कर मोक्ष पाने मे सफल होता है। मार्कण्डेयपुराण में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व एवं वशित्वये आठ सिद्धियाँ बतलायी गयी है। भगवती सिद्धिदात्री उपरोक्त संपूर्ण सिद्धियाँ अपने उपासको को प्रदान करती है। माँ दुर्गा के इस अंतिम स्वरूप की आराधना के साथ ही नवरात्र के अनुष्ठान का समापन हो जाता है।

इस दिन को रामनवमी भी कहा जाता है और शारदीय नवरात्रि के अगले दिन अर्थात दसवें दिन को रावण पर राम की विजय के रूप में मनाया जाता है। दशम् तिथि को बुराई पर अच्छाकई की विजय का प्रतीक माना जाने वाला त्योतहार विजया दशमी यानि दशहरा मनाया जाता है। इस दिन रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के पुतले जलाये जाते हैं।

Thursday, September 6, 2012

Deo wikipedia

http://en.wikipedia.org/wiki/User:Raajeevdeo

Before Nepal's emergence as a nation in the later half of the 18th century, the designation 'Nepal' was largely applied only to the Kathmandu Valley and its surroundings. Thus, up to the unification of the country, Nepal's recorded history is largely that of the Kathmandu Valley. References to Nepal in the Mahabharata epic, in Puranas and in Buddhist and Jaina scriptures establish the country's antiquity as an independent political and territorial entity. The oldest Vamshavali or chronicle, the Gopalarajavamsavali, was copied from older manuscripts during the late 14th century, is a fairly reliable basis for Nepal's ancient history. The Vamshavalis mention the rule of several dynasties the Gopalas, the Abhiras and the Kiratas—over a stretch of millennia. However, no historical evidence exists for the rule of these legendary dynasties. The documented history of Nepal begins with the Changu Narayan temple inscription of King Manadeva I (c. 464–505 AD) of the Licchavi dynasty.
During the time of Gautama Buddha, the kings of the Lichchhavi dynasty were ruling over Baisali (Muzaffarpur, in modern Bihar in India). Baisali had a partly democratic form of government. According to the later inscription by King Jaya Dev II, Supushpa was the founder of the dynasty, but he was defeated by Ajatashatru, the powerful Magadha king, in the fifth century BC.
When the kings of the Kushan empire became powerful in India, the Lichchhavis migrated to Nepal. The twenty-fourth descendant of King Supushpa, Jaya Dev II, re-established the rule of the Lichchhavis in Nepal. Brisha Dev was another powerful member of the dynasty who greatly extended his territory. Chandra Gupta I, the Gupta Indian emperor, was alarmed of the rise of Brisha Dev. However, he preserved the sovereignty of India by the use of politics rather than warfare. He visited Nepal and married Kumara Devi, the daughter of Brisha Dev. Kumara Devi gave birth to Chandra Gupta's successor, Samundra Gupta. Some historians are of the opinion that it was Bhasker Verma, not Brisha Dev who was the father of Kumara Devi.
Mana Deva is considered to be the first king of Nepal having historical authenticity.

http://deosamaj.wordpress.com/2011/01/29/deo-samaj/ 

Wednesday, September 5, 2012

Madhesh Wikipedia

The word 'Madhesh' is derived from 'Madhya Desh' meaning 'country in the middle'or Magadh, it was powerful state after fall the Brijisangh. Some scholars show its origin in 'Matsya Desh' meaning 'country of fish'.
The social groups that constitute the present day Madhesh are Yadav/Ahir, Chaurasia/Barai, Kaanu, Koiri, Dhanuk, Teli, Amat, Rajbhar, Kurmi, Danuwar, Karna, Dev " Deo-Chaudhary ",Poddar, Jha etc. For many years the jungles acted as a buffer between Nepal and India. The eradication of Malaria and large scale clear cutting of the forests made the fertile plains heavily attractive to migrants from the mountains and especially from the densely populated Indian side of the border. The mainly uncontrolled migration from India has always been of concern to the Nepali government and it was reluctant to grant civil rights even in the second or third generations. Today, about half the Nepali population lives in the Terai and a considerable proportion of the Terai population is of Madheshi decent. The Madheshi claim that although Nepal nominally became a democracy in 1990, historical patterns of government employment being won by the Khas people continued to the present day. This has recently lead to demonstrations, the outbreak of violence and the establishment of political parties demanding equal rights, fair representation, greater autonomy within Nepal and even independence.

http://en.wikipedia.org/wiki/Madhesh#References

References

  • Tarai?Madhesh of Nepal, An anthropological Study - book in English; 2011, by Deepak Chaudhary, publisher- Ratna Pustak Bhandar
www.ratnabooks.com
Mr Rajeev Deo www.deosamaj.blogspot.com www.deosociety.blogspot.com http://groups.google.com/group/deosam

 http://groups.google.com/group/deosamaj
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http://deosamaj.blogspot.com/
http://www.facebook.com/deo.samaj

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Monday, May 21, 2012

history of deo


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·         Tarai/Madhesh of Nepal: An Anthropological Study. k|sfzs /Tg k':ts e08f/

Wednesday, May 16, 2012

आदिवासी,मधेशी, अल्प्शंकियक देव जतिक संरक्छंन तथा आरक्षण ( जातीय सूचीकरण ) सम्बन्धमे

बिषय :- छलफल तथा जलपान कार्यक्रममे अनिवार्य उपस्थीति सम्बन्धमे

महासय ,

तप्सिल्के बिषय बस्तुमे छलफलके लेल अप्नेक अनिवार्य उपस्थितिक ले बिनम्र अनुरोध अछी |
समस्त देव, चौधरी & पौदार स्वजाति लोक्नीसब से बिनम्र अन्नुरोध अछ | जे कृपिया समस्त देव जाति अस्तितव के सवाल अछ | हम आहा देव जातिके अस्तितव बचाबाईले चहाही छि कि नै.. यदी जातिके अस्तितव नै रहत ते हमार अहाके अस्तितव कतेसे रहत.. तही हेतु कृपिया समस्त स्वजाति लोग्नी देव समाज के आनतिरिक बिसयक छलफल कार्यकर्म मे अबस्य उपस्थिति होऊ.. अखण के देश के ब्रत्मान शघियत के जे सबाल अछ तैके ले हमर अहाके जातीय अस्तितव के सबाल अछ .हम अहाके एक जुट होइके परत |

तपशिल
१ . आदिवासी,मधेशी, अल्प्शंकियक देव जतिक संरक्छंन तथा आरक्षण ( जातीय सूचीकरण ) सम्बन्धमे .
     ( काठमाडौँ मे जुलुस तथा रेली ,पर्धान्मंत्री के ज्ञापन पत्र ,पत्रकार कार्यक्रम , सप्तरी मे यता    यात बन्द सबके बारेमे बिसेस छलफल )
२ . अक्षयकोष बय्बस्थान्पन सम्बन्धम.
३ .
सामुदायिक - सामुहिक बिवाह सम्भंधमे .
४ . देव जातीक बिबिध समस्या सम्बंध्मे.

समय : - अपरान्ह ११ बजे
मिति : - २०६९ | ०२  | ०६
स्थान : - पेन्टागन इन्टरनेश्नल , कल्लेज, तिनकुने काठमाडौँ.

आयोजक
देव समाज

Friday, May 11, 2012

समस्त देव स्वजाति लोग्निके अबगत करारहल्छी कि देव जाति जे आन्तिरिक कार्य कर्म   लिटिल फ्लावर स्कूल, ज्ञानेश्वर, काठमाडौँ   जे होइबाला रहल इ कार्य क्रम के स्थान परिबर्तन कायल गेल अछ; स्थान : - बिस्वभाषा कयाम्पस भीरुकुट्टी मण्डप के सामने होयत ... स्थान परिबर्तन के ले देव समाज क्षमा प्रार्थी छि. | 

बिषय :- छलफल तथा जलपान कार्यक्रममे अनिवार्य उपस्थीति सम्बन्धमे 


महासय ,
           तप्सिल्के बिषय बस्तुमे छलफलके लेल अप्नेक अनिवार्य उपस्थितिक ले बिनम्र अनुरोध अछी |
        तपशिल
  1. आदिवासी,मधेशी, अल्प्शंकियक देव जतिक संरक्छंन तथा आरक्षण ( जातीय सूचीकरण ) सम्बन्धमे .
  2. सामुदायिक - सामुहिक बिवाह सम्भंधमे .
  3. अक्षयकोष बय्बस्थान्पन सम्बन्धमे 
  4. देओ जतिक बिबिध समस्या सम्बंध्मे  
समय : - अपरान्ह १ बजे
मिति : - २०६९ | ०१ | ३०
स्थान : - 
बिस्वभाषा कयाम्पस भीरुकुट्टी मण्डप के सामने ,काठमाडौँ 

आयोजक
देव समाज

Wednesday, May 9, 2012

देव

देव जाति के कल्चर रहन शाहन शादी बिहबा, उप्नायन, मुण्डन, और अन्य सामाजिक रितिरिवाज सब किछ फरक अछ., नहिते कायस्थ , ब्राह्मण समुदाय से देव जति के कोइभी बैबाहिक सम्बन्ध नै होइके अछ.बिल्कुल हि हम देव जतिके पहिचान अलग अछ. हम्सब देव जतिके एक अलग पहिचान अछ.

Tuesday, May 8, 2012

 समस्त देव  स्वजातिय लोकनिसे बिनम्र अनुरोध आछी जे किर्पिया आपने सब समस्त देव जति के पहिचान कराबैले चाहैछी कि नै कियक कि देव समाजके कोइभी आन्तरिक छलफल कार्यक्रम मे काठमाडौँ मे रहनिहर देव जति के बुद्धिजिबी, शालाकार लोक्नी सब कियो भी आबैले नाइके चाहैछी किया... यदि देव जतिके लेल अखण हम सब यदि जागरुक नै होयाब ते हमर अहाके जतिके आस्तितव लोप भा जेत तही हेतु अपने शब् देव समाज के कार्यक्रम मे आवस्य सहभागी होउ.अखण के ब्रत्मान परिवेश मे जे देव जति मे अन्तर जातीय  ( पहाडी अनीय जति ) बिबाह जे भरहल अछ | और | प्रेम बिबाहके जे हम आहा जाके अरंज कर्के समस्त देव समुदाय के कुछ महानुबाब लोक्नी  सब  जाके प्रोत्सहन क दै छि | इसलिए समस्त देश विदेश मे रानीहर देव जति के महानुभाब के आब्गत होइके चाही कि किर्पिया हम अह सब कियो मिल के . देव जति के हक हित संरक्छं के बरेमे सोइच के एक अहँ मिशाइल कायम करु जे हमार अहाके जातीय पहिचान मे कोइ आच नै आवक चाही... देव जति के बागेश्वरी सेवा समिति , भवानी सेवा समिति के पदाधिकारी लोक्नी एक आपसमे लडाई झगडा क के हम आहा के अल्प शंखियक जति मे त एकजुट होउ..  देव जतिके बिनाश अबश्य अछ तही हेतु. समय मे देव जति सब जागरुक होइके आपन कुल्च्र, रहन सहन , भाषा और संस्कृति के बचाऊ..

Monday, May 7, 2012

                    बिषय :- छलफल तथा जलपान कार्यक्रममे अनिवार्य उपस्थीति सम्बन्धमे
महासय ,
           तप्सिल्के बिषय बस्तुमे छलफलके लेल अप्नेक अनिवार्य उपस्थितिक ले बिनम्र अनुरोध अछी |
        तपशिल
  1. आदिवासी,मधेशी, अल्प्शंकियक देव जतिक संरक्छंन तथा आरक्षण ( जातीय सूचीकरण ) सम्बन्धमे .
  2. सामुदायिक - सामुहिक बिवाह सम्भंधमे .
  3. अक्षयकोष बय्बस्थान्पन सम्बन्धमे
  4. देओ जतिक बिबिध समस्या सम्बंध्मे 
समय : - अपरान्ह १ बजे
मिति : - २०६९ | ०१ | ३०
स्थान : - लिटिल फ्लावर स्कूल, ज्ञानेश्वर, काठमाडौँ

आयोजक
देव समाज

Sunday, November 13, 2011

Culture Of Deo " Deo Samaj "

Culture Of Deo
Maithili, an Eastern Indic language, is spoken in Mithila. Maithili has previously been considered a dialect of both Hindi and Bengali. Today Maithili, is recognized in the Eighth Schedule of Indian official languages. Maithili sounds sweet and soft to outsiders, who often cannot tell whether an argument is taking place. In southern districts of Mithila Angika is spoken.
The Mithila region is rich with culture and traditions. People respect their parents, believe in peaceful life and have a strong belief in God. They worship the goddess of Power Durga. Every home of Mithila has own God or Goddess named Kuldevta. They generally live in larger families. The Hindu festivals are widely celebrated : Makar Sankranti(14 January), Basant Panchami, Shivratri.Holi, Ram Navami, New Year(Mesha Sankranti on 14 April usually, Janaki Navami(Baishakh Shukla 9), Batsavitri, Madhushravani, Nagpanchami, Rakshabandhan,Krishna Janmashtami,Chauth Chandra, Durga Puja, Kojagara(Sharad Purnima), Diwali, Bhatridwitiya, Chhathi, Akshya Navami, Devotthan Ekadashi, Sama Chakeba,Kartik Purnima, Vivaha Panchami,etc. in which some are specific in Mithila e.g.Chauth Chandra when Ganesh Chaturthi in Bhadrapad is celebrated rest of India) and Indra Puja in Ashwin Krishna Paksha and So Bhatridwitiya and Sama Chakeba in Kartik Shuklapaksha-are festivals for brothers and sisters apart from Rakhabandhan as in other parts of Indian subcontinent.

A Mundan ceremony in Mithila.
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A Mundan ceremony in Mithila.
The Mundan ceremony is a very popular tradition in Mithila. A child's hair is shaved for the first time, accompanied by bhoj (a party) and (sometimes extravagant) celebrations.
The Maithili marriage traditions are important to the people and unique to the region. The custom includes four days of marriage ceremonies called: Barsait,Chautrthi, Madhushravni, Kojagara, and finally Dwiragman (the first homecoming of the bride). The marriage is traditionally fixed using complex genealogical tables, called Panji among Brahmins, “Deo-Chaudhary Deo and Karna Kayasthas which are maintained by Panjikars, a special group of Brahmins who prevent marriages among relatives up to sixth degree in Matripaksha and seventh in Pitripakksha.
The name Mithila is also used to refer to a style of Hindu art, Madhubani art, created in the Mithila area. This art originated as ritual geometric and symbolic decorations on the walls and floors of a house, generally done by women before a marriage. The custom was not known to many outside the region. After paper was brought to the area, women began to sell their artwork and expand their subjects to popular and local Hindu deities as well as to the depiction of everyday events. Ganga Devi is perhaps the most famous Mithila artist; her work includes traditional ritual Mithila decorations, depictions of popular deities, scenes from the Ramayana, and events in her own life.
Folk stories A small film industry also exists. Of the many movies produced in Mailthili, "Sasta Jingi Mahag Senoor" and "Mamta Gabe Geet" are perhaps the best known.Off late " Sindurdan " also collected accolades. Among the documentary films that best presents the unparalleled cultural richness of Mithila are "The Cultural Heritage of Mithila" which showcases Pamaria, Pachania, Bhaant, Panaji-Prabandh, Sama-Chakeva, Salhes naach and Salhes gaatha gaayan, Kamla-Pooja etc. and "Mithila Paintings" which showcases the insights into the past, present and emerging forms of the Mithila Paintings.

Maithili (মৈথিলী Maithilī) is a language spoken in the eastern part of India, mainly in the Indian state of Bihar, and in the eastern Terai region of Nepal.[1]
It is an offshoot of the Indo-Aryan languages, which are part of the Indo-Iranian, a branch of the Indo-European languages. Linguists consider Maithili to be an Eastern Indic language, and thus a different language from Hindi, which is Central Indic in origin. According to the 2001 census in India, 12,179,122 people speak Maithili, but various organizations have strongly argued that the actual number of Maithili speakers is much higher than the official data suggests. SIL estimates it to be more than 35 Million. In 2003, Maithili was included in the Eighth Schedule of the Indian Constitution, which now allows the language to be used in education, government, and other official contexts. Maithili has a very rich literary and cultural heritage.
Maithili was traditionally written in the Maithili script (also known by the names Tirhuta and Mithilakshar) and Kaithi script. Nowadays, Devanagari script is most commonly used. An effort is underway to preserve the Maithili script and to develop it for use in digital media by encoding the script in the Unicode standard, for which proposals have been submitted.[2]
The term Maithili comes from Mithila, which was an independent state in ancient times. Mithila has a very important place in Hindu mythology, since it is regarded as the birth place of Goddess Sita, the daughter of King Janak of Mithila; who eventually gets married to Lord Rama.
The most famous literary figure in Maithili is the poet Vidyapati. He is credited for raising the importance of 'people's language', i.e. Maithili, in the official work of the state by influencing the Maharaja of Darbhanga with the quality of his poetry. The state's official language used to be Sanskrit, which distanced common people from the state and its functions. The name Maithili is also one of the names of Sita, the consort of Rama.
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The name Maithili is derived from the word Mithila, an ancient kingdom of which King Janaka was the ruler (See Ramayana). Maithili is also one of the names of Sita, the wife of King Rama and daughter of King Janaka.
It is a fact that scholars in Mithila used Sanskrit for their literary work and Maithili was the language of the common folk (Abahatta). The earliest work in Maithili appears to be Varna(n) Ratnakar by Jyotirishwar Thakur dated about 1324


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